झारखंड के आदिवासी और वनवासी समुदायों के लिए जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है। वह भोजन है, आजीविका है, पहचान है। ऐसे में उनके अधिकार तभी अर्थपूर्ण हैं, जब वे काग़ज से उतरकर जीवन तक पहुँचें। अंबेडकर सामाजिक संस्थान (ASI) इसी दिशा में काम करती है।
ग्राम स्वराज अभियान: अधिकार-आधारित दृष्टि
ASI ने ग्राम स्वराज अभियान के माध्यम से कई अधिकार-आधारित पहलों में अग्रणी भूमिका निभाई है:
• वन अधिकार अधिनियम (FRA): समुदायों को उनके वैधानिक सामुदायिक व व्यक्तिगत वन पट्टे के हक़ की जानकारी देना।
• मनरेगा (MGNREGA): रोज़गार की कानूनी गारंटी को वास्तविक ग्रामीण आजीविका से जोड़ना।
• खाद्य सुरक्षा (PDS, ICDS): राशन और पोषण जैसी बुनियादी ज़रूरतों के प्रति सजगता।
शासन में गाँव की भागीदारी
योजनाओं की जानकारी देना पहला कदम है, उन्हें लागू करवाने की क्षमता बनाना दूसरा। इसीलिए संस्था पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के सदस्यों को प्रशिक्षित करती है। प्रशिक्षित प्रतिनिधि अपने गाँव की ज़रूरतों को सही मंच पर रख पाते हैं और योजनाओं की निगरानी कर पाते हैं। यही ग्राम स्वराज की व्यावहारिक नींव है।
जैविक खेती: पर्यावरण और आजीविका का संगम
पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के क्षेत्र में ASI जैविक खेती (Bio Agriculture) और सब्ज़ी उत्पादन को बढ़ावा देती है। इसका लाभ दोहरा है: किसान की आय और आत्मनिर्भरता बढ़ती है, और मिट्टी, जल तथा जैव विविधता की रक्षा भी होती है। यह एक सतत विकास मॉडल है, जिसमें विकास प्रकृति के विरुद्ध नहीं, उसके साथ चलता है।
समापन
जब ग्रामीण समाज अपने संवैधानिक अधिकारों को पहचानता है और उन्हें अपनी आजीविका से जोड़ पाता है, तब विकास ऊपर से थोपा हुआ नहीं रहता, भीतर से उपजता है। ASI का प्रयास इसी दिशा में एक सुदृढ़ कदम है।